| जुबा तो डरती है कहने से | |||
| पर दिल जालीम कहता है | |||
| उसके दिल में मेरी जगह पर | |||
| और ही कोई रहता है ॥ धृ ॥ | |||
| बात तो करता है वोह अब भी | |||
| बात कहाँ पर बनती है | |||
| आदत से मैं सुनती हूँ | |||
| वोह आदत से जो कहता है ॥ १ ॥ | |||
लाभले अम्हास भाग्य बोलतो मराठी । जाहलो खरेच धन्य ऐकतो मराठी ॥ धर्म, पंथ, जात एक जाणतो मराठी । एवढ्या जगात माय मानतो मराठी ॥-सुरेश भट माझी मराठीची बोलु कौतुके। परि अमृताते ही पैजा जिंके। ऐसी अक्षरे रसिके मेळविण॥ - श्री संत ज्ञानेश्वर.
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गझल - संदिप खरे..... Ghazal by Sandip Khare
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